1 00:00:00,250 --> 00:00:18,660 बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। वहाँ के राजा थे महाराज देववर्मन। वे वीर थे, धनवान थे और उनकी सेना इतनी बड़ी थी कि आसपास के सारे राजा उनसे डरते थे। 2 00:00:18,910 --> 00:00:34,650 पर देववर्मन में एक कमी थी: उन्हें अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। वे अक्सर दरबार में गर्व से कहते थे, 'दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जिसे मैं अपने बल से वश में न कर सकूँ।' 3 00:00:34,900 --> 00:00:52,710 एक दिन राजदरबार में एक बूढ़े साधु आए। उनके साथ चार घोड़े थे, एक काला, एक सुनहरा, एक सफ़ेद और एक लाल। चारों इतने सुंदर और बलवान थे कि पूरा दरबार देखता रह गया। 4 00:00:52,960 --> 00:01:15,540 साधु बोले, 'महाराज, सुना है आप हर चीज़ को वश में कर लेते हैं। ये चार घोड़े मैं आपको भेंट करना चाहता हूँ। पर एक शर्त है। इन चारों को एक ही रथ में जोतकर कल सूर्योदय से पहले पहाड़ी वाले शिव मंदिर तक पहुँचना होगा।' 5 00:01:15,790 --> 00:01:33,930 'पहुँच गए, तो आप सचमुच महान राजा हैं। न पहुँच सके, तो समझ लीजिए आपका राज्य अभी अधूरा है।' राजा हँस पड़े और बोले, 'बस इतनी-सी बात? ये तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है।' 6 00:01:34,180 --> 00:01:53,570 साधु मुस्कुराए और बोले, 'इनके नाम भी जान लीजिए। काला घोड़ा क्रोध है, सुनहरा लोभ है, सफ़ेद मोह है और लाल अहंकार है।' राजा ने नामों पर ध्यान नहीं दिया। उन्हें लगा, घोड़ा तो घोड़ा होता है। 7 00:01:53,820 --> 00:02:11,220 आधी रात को चारों घोड़े रथ में जोते गए। राजा ने लगाम पकड़ी और जैसे ही रथ चला, गड़बड़ शुरू हो गई। काला घोड़ा (क्रोध) ज़रा-सी आवाज़ पर भड़क उठता और बेकाबू होकर दौड़ पड़ता। 8 00:02:11,470 --> 00:02:28,440 राजा ने गुस्से में उस पर चाबुक चलाया, तो वह और भड़क गया और रथ पलटते-पलटते बचा। सुनहरा घोड़ा (लोभ) रास्ते के किनारे जहाँ भी हरी घास या चमकती चीज़ देखता, उधर ही मुड़ जाता। 9 00:02:28,690 --> 00:02:45,130 उसे आगे जाने से ज़्यादा रास्ते की हर चीज़ चाहिए थी। सफ़ेद घोड़ा (मोह) बार-बार पीछे महल की ओर मुड़कर देखता। उसे अपना अस्तबल, अपनी आदतें छोड़नी ही नहीं थीं। 10 00:02:45,380 --> 00:03:01,800 वह हर कदम पर पीछे खिंचता। और लाल घोड़ा (अहंकार) किसी के पीछे चलना ही नहीं चाहता था। वह हमेशा सबसे आगे रहना चाहता था और बाकी तीनों को धक्का देता रहता। 11 00:03:02,050 --> 00:03:19,520 चारों घोड़े चार दिशाओं में खींच रहे थे। राजा जितना ज़ोर लगाते, रथ उतना ही डगमगाता। चाबुक चला-चलाकर उनके हाथ छिल गए, पसीने से कपड़े भीग गए, और आधी रात बीत गई। 12 00:03:19,770 --> 00:03:33,520 रथ महल के फाटक से सौ कदम भी आगे नहीं बढ़ा था। थककर राजा ज़मीन पर बैठ गए। पहली बार उन्हें लगा कि बल हर जगह काम नहीं आता। 13 00:03:33,770 --> 00:03:52,510 तभी अस्तबल का एक बूढ़ा सारथी, रामदीन, लालटेन लेकर आया। उसने चालीस साल घोड़े सँभाले थे। उसने धीरे से कहा, 'महाराज, गुस्ताख़ी माफ़ हो। आप इन घोड़ों से लड़ रहे हैं।' 14 00:03:52,760 --> 00:04:08,190 'घोड़े लड़ने से नहीं, समझने से चलते हैं।' राजा ने पहली बार किसी छोटे आदमी की बात ध्यान से सुनी। 'तो बताओ, क्या करूँ?' रामदीन बोला, 'काले घोड़े को चाबुक मत मारिए।' 15 00:04:08,440 --> 00:04:24,380 'आग पर आग डालने से आग बुझती नहीं। जब वो भड़के, आप शांत रहिए, लगाम ढीली मत छोड़िए, पर झटका भी मत दीजिए। धीरे-धीरे वो आपकी शांति पकड़ लेगा।' 16 00:04:24,630 --> 00:04:40,930 'सुनहरे घोड़े की भूख खत्म नहीं होगी, पर उसे दिशा दी जा सकती है। उसकी आँखों पर पट्टी (अंधियारी) लगाइए, ताकि उसे सिर्फ़ सामने का रास्ता दिखे, इधर-उधर की चमक नहीं।' 17 00:04:41,180 --> 00:04:58,960 'सफ़ेद घोड़े को पीछे का मोह है। उसे मंदिर की ओर से आती घंटियों की आवाज़ सुनाइए, ताकि उसे आगे कुछ बेहतर दिखे। जिसे आगे की मंज़िल प्यारी हो जाए, वो पीछे नहीं देखता।' 18 00:04:59,210 --> 00:05:13,780 'और लाल घोड़े को सबसे आगे मत जोतिए। उसे बाकी तीनों के साथ बराबरी में रखिए। अहंकार को आगे रखोगे तो वो पूरे रथ को खाई में ले जाएगा।' 19 00:05:14,030 --> 00:05:28,430 राजा ने वैसा ही किया। अब वे चिल्ला नहीं रहे थे, चाबुक नहीं चला रहे थे। वे धैर्य से, एक-एक घोड़े को समझते हुए लगाम सँभाल रहे थे। 20 00:05:28,680 --> 00:05:42,260 धीरे-धीरे चारों घोड़े एक लय में आने लगे। रथ चल पड़ा, पहले धीमे, फिर स्थिर, फिर तेज़। पहाड़ी की चढ़ाई पर भी रथ नहीं डगमगाया। 21 00:05:42,510 --> 00:05:55,010 और जैसे ही पूरब में सूरज की पहली किरण निकली, राजा का रथ शिव मंदिर के द्वार पर खड़ा था। मंदिर की सीढ़ियों पर वही साधु बैठे थे। 22 00:05:55,260 --> 00:06:09,710 राजा ने उतरकर पहली बार किसी के सामने सिर झुकाया। साधु बोले, 'महाराज, आपने घोड़े नहीं जीते। आपने खुद को जीता है।' राजा चौंके, 'मतलब?' 23 00:06:09,960 --> 00:06:25,440 साधु ने समझाया, 'ये चारों घोड़े हर इंसान के अंदर हैं। क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। शरीर रथ है, मन लगाम है, और बुद्धि सारथी है।' 24 00:06:25,690 --> 00:06:39,420 'जो आदमी इन्हें चाबुक से दबाने की कोशिश करता है, वो थककर हार जाता है। जो इन्हें ढीला छोड़ देता है, उसका रथ खाई में गिरता है।' 25 00:06:39,670 --> 00:06:54,050 'पर जो इन्हें समझकर, धैर्य से, सही दिशा में लगाता है, वही मंज़िल तक पहुँचता है। इन घोड़ों को मारना नहीं है, क्योंकि यही ताक़त भी हैं।' 26 00:06:54,300 --> 00:07:11,890 'काबू में आया क्रोध अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने की हिम्मत बनता है। दिशा पाया लोभ मेहनत और तरक्की की भूख बनता है। सही जगह लगा मोह परिवार और प्रजा के लिए प्रेम बनता है।' 27 00:07:12,140 --> 00:07:26,180 'और झुका हुआ अहंकार आत्मसम्मान बन जाता है। आपके पास बड़ी सेना है, महाराज, पर जो अपने मन का राजा नहीं, वो असल में किसी का राजा नहीं।' 28 00:07:26,430 --> 00:07:43,520 राजा की आँखें भर आईं। उस दिन के बाद देववर्मन बदल गए। वे प्रजा की बात सुनने लगे, छोटे-बड़े सबका आदर करने लगे, और बूढ़े रामदीन को उन्होंने अपना सलाहकार बना लिया। 29 00:07:43,770 --> 00:08:02,440 सूर्यगढ़ पहले बलवान राज्य था, अब वह सुखी राज्य बन गया। दुनिया जीतना आसान है, खुद को जीतना कठिन। जो अपने क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की लगाम सँभाल ले, वही सच्चा राजा है। 30 00:08:02,690 --> 00:08:20,400 साथ ही दो छोटी सीखें भी: हर समस्या ताक़त से हल नहीं होती, धैर्य और समझ कई बार ज़्यादा काम आते हैं। और ज्ञान किसी से भी मिल सकता है, चाहे वह अस्तबल का बूढ़ा सारथी ही क्यों न हो।